अल्मोड़ा। सोबन सिंह जीना राजकीय आयुर्विज्ञान एवं शोध संस्थान में बुधवार को जूनोटिक बीमारियों की निगरानी, रोकथाम और नियंत्रण को प्रभावी बनाने के उद्देश्य से एक दिवसीय इंडक्शन प्रशिक्षण कार्यशाला आयोजित की गई। सूक्ष्मजीव विज्ञान विभाग और राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र (एनसीडीसी) के राष्ट्रीय जूनोटिक रोग रोकथाम एवं नियंत्रण कार्यक्रम के तहत स्थापित सेंटिनल सर्विलांस साइट फॉर जूनोज की ओर से आयोजित कार्यशाला में चिकित्सकों और स्वास्थ्य कर्मियों को ‘वन हेल्थ’ अवधारणा के तहत रोगों की शीघ्र पहचान और प्रभावी निगरानी का प्रशिक्षण दिया गया। कार्यशाला का उद्घाटन संस्थान के प्राचार्य प्रो. (डॉ.) जी.एस. तितियाल ने किया। उन्होंने कहा कि स्क्रब टाइफस, रेबीज, ब्रुसेलोसिस और लेप्टोस्पायरोसिस जैसे पशुजनित संक्रामक रोग पर्वतीय क्षेत्रों में जनस्वास्थ्य के लिए बड़ी चुनौती हैं। इन पर प्रभावी नियंत्रण के लिए मानव, पशु और पर्यावरण स्वास्थ्य के समन्वित ‘वन हेल्थ’ दृष्टिकोण को मजबूत करना आवश्यक है। चिकित्सा अधीक्षक डॉ. दिनेश पुनेरा ने अस्पताल की ओपीडी और आईपीडी में आने वाले संदिग्ध मरीजों की समय पर पहचान, जांच और मानक उपचार प्रोटोकॉल के पालन पर जोर दिया। नोडल अधिकारी डॉ. विक्रांत नेगी ने कुमाऊं मंडल में जूनोटिक रोगों की वर्तमान स्थिति, निगरानी प्रणाली और भविष्य की कार्ययोजना प्रस्तुत की। प्रशिक्षण के दौरान मेडिसिन विभागाध्यक्ष डॉ. अशोक कुमार ने मानक केस डेफिनिशन के आधार पर रोगों की शीघ्र पहचान की जानकारी दी, जबकि कम्युनिटी मेडिसिन विभाग के डॉ. अंशुल ममगाईं ने ‘डिटेक्ट, रिपोर्ट, रिस्पॉन्ड’ रणनीति पर व्याख्यान दिया। डॉ. रवि सैनी के निर्देशन में केस रिकॉर्ड फॉर्म भरने का व्यावहारिक प्रशिक्षण भी कराया गया। कार्यशाला का संचालन मेडिकल सोशल वेलफेयर ऑफिसर हेम बहुगुणा ने किया। कार्यक्रम में डॉ. उर्मिला पलड़िया, डॉ. एम. अनुराधा, डॉ. अमित आर्य, डॉ. नौशीन, आईडीएसपी के एपिडेमियोलॉजिस्ट नरेंद्र, माइक्रोबायोलॉजिस्ट अभिषेक मेहरा सहित विभिन्न विभागों के संकाय सदस्य, रेजिडेंट डॉक्टर, नर्सिंग अधिकारी और प्रयोगशाला प्राविधिक मौजूद रहे। समापन सत्र में प्रतिभागियों का प्री एवं पोस्ट टेस्ट मूल्यांकन किया गया, केस डिस्कशन आयोजित हुए और सफल प्रतिभागियों को प्रमाण पत्र वितरित किए गए।
